भीलवाड़ा (हलचल)। लोक कथाओं के अनुसार बम्बावदा के समीपस्थ ही जोगणियाँ माता हाड़ाओं की आराध्या (कुलदेवी) थी। उन्हीं की व्यवस्थानुकूल इस मंदिर की सेवापूजा होती थी। राव देवा की पुत्री के विवाहोत्सव पर राव देवा ने जगदम्बा जोगणियां को सादर आमंत्रित कर प्रार्थना की कि मां उसका निमंत्रण स्वीकार कर उसे उपकृत करें। राव देवा की विनम्रता से द्रवित होकर मां प्रकट हुई किन्तु विवाहोत्सव के अवसर पर उसके राज महलों में जाने से मना कर दिया। राजा देवा बड़ा दुःखी हुआ तथा उसने कातर स्वर में दीनभाव से बारम्बार मां के चरणों में मस्तक रखकर अनुनय विनय की। माता का हृदय पुत्र की प्रार्थना पर अन्ततोगत्वा पसीजा। माता ने रजामंदी तो जाहिर कर दी किन्तु कहा - "राजद्वार पर आने पर मुझे पहचानेगा कौन?" प्रहरीगण बिना पहचान किये मुझे भीतर प्रवेश ही नहीं करने देंगें।" राजा के सामने भी यह एक अजीब सवाल था, एक ऐसी उलझन जिसका हल समझ में नहीं आ रहा था। प्रहरी समय-समय पर बदलते हैं तथा
प्रत्येक प्रहरी को मां के स्वरूप, वेशभूषा आदि का ज्ञान कराना भी संभव नहीं था। ऐसा विचार कर देवा निरूपाय घबराया। ऐसी स्थिति में माता ने उसे समझाया कि वह ऐसा हठ न करे क्योंकि सही पहचान और सही सम्मान न होने पर अपमान की स्थिति मां के गौरव एवं गरिमा के अनुकूल नहीं होगी। किन्तु राव देवा भी संभवतः राज्याभिमान के कारण माता को बुलाने हेतु अपनी आन-बान का सवाल बना चुका था। देवा ने अपने भीतर के 'स्व' को छिपाते हुए अपना आग्रह बनाये रखा तथा मां को ही इस उलझन का उपाय बताने की प्रार्थना की।
तब मां ने कहा- "तेरी इच्छा पूरी हो, मैं आऊंगी और अवश्य आऊंगी। तू राजमहल के रसोई घर में बिना जले हुये चूल्हे पर शुद्ध कच्चा दूध बर्तन में रखवा देना। दूध जब गर्म होकर उफान पर आ जाये तो समझ लेना कि मैं राजद्वार पर पहुंच चुकी हूँ किन्तु खबरदार यदि राजद्वार पर मेरा अनुकूल स्वागत नहीं हुआ तो निश्चय ही अपमानित होने पर मैं शाप दे सकती हूं।" हठ के धनी राव देवा ने यह आदेश स्वीकार कर लिया और खुशी-खुशी अपने महलों को लौटा। माँ अपने बेटों को कभी दुःखी नहीं करती बल्कि उनके दुःख निवारण हेतु सदैव वरदहस्त लिये अपने पुत्रों की रक्षा करती है। "कुपुत्रों जायते कवचिदपि कुमाता न भवति"। माँ जगदम्बा ने देवा को दिये वचन के अनुसार निश्चित दिन को प्रातः राज भवन के लिये प्रस्थान किया। एक रोगग्रस्त जोगण का रूपधारण किये मैले मैले, फटे-फटे वस्त्र, बिखरे-बिखरे बाल, चेहरे पर अजीब प्रकार का रंग पुता हुआ और समूचे अंग-प्रत्यंग पर जोगण का डरावना श्रृंगार लिये इस श्रृंगार विभिषिका में माँ देवा हाड़ा के राजद्वार पर खड़ी थी। उधर आदेशानुसार महलों में दूध भरा बर्तन बिना जलाये हुये चूल्हे पर रखा था। एक सेवक दूध का उफान आने की सूचना राजा को देने के लिये तैनात था। राजा वैवाहिक तथा राजकार्यों के साथ-साथ मेहमानों की खातिरदारी एवं बातचीत में व्यस्त था क्योंकि उसके अपने संज्ञान में
दूध के बारे में सूचना देने के लिये उचित प्रबन्ध था। इसके लिये नियुक्त सेवक दूध के उफान की प्रतीक्षा में अपना पूरा ध्यान रख रहा था कि अकस्मात किसी आवश्यक कार्यवश उसे वहां से हटने को विवश होना पड़ा। उसे वापस लौटने में तनिक विलम्ब भी हो गया। विलम्ब की इन्हीं घड़ियों में दूध गर्म हुआ और उफनने लगा। सेवक जब लौटकर आया तक तक अधिकांश दूध उफनकर बर्तन के बाहर आ गया था और चूल्हे के चारों ओर इकट्ठा हो गया। सेवक यह दृश्य देखकर घबराया और भयभीत राजा को अर्ज करने हेतु भागा। नीचे राजद्वार पर खड़ी थी वह विचित्र वसना जोगन। प्रवेश द्वार में घुसते ही प्रहरी कड़क कर बोलते हुए उसे रोकने को बढ़ा। उस महिला ने बताया कि उसे तो राजा ने बुलाया है किन्तु द्वारपाल के लिये यह विश्वास करना संभव ही नहीं था कि राजा किसी ऐसी भयंकारी महिला को बुला भी सकता है। प्रहरी ने अपमानजनक कटु वचनों का प्रयोग करते हुये उसे धक्के देकर राजद्वार से बाहर निकाल दिया। उधर दूध उफान की सूचना प्राप्त होते ही राव देवा भागते हुये दरवाजे पर पहुँचा किन्तु होनहार टलता ही नहीं। माँ दुर्गा वहां से तुरन्त लौट गयी अथवा लुप्त हो गई। राव देवा ने द्वारपाल को खूब डांटा-फटकारा, किन्तु अब क्या हो सकता था। सिवा क्षमायाचना व पश्चाताप के कोई अन्य उपाय नहीं था।
राव देवा महत्वाकांक्षी अवश्य था किन्तु इस घटना का सम्बन्ध उसकी महत्वाकांक्षा से नहीं बल्कि माँ जगदम्बा के प्रति उसका आस्था एवं विश्वास भी था। कहते हैं बारात नागौर के राठौड़ राज परिवार से थी। उपरोक्त अनहोनी का वृतान्त यदि बारात पक्ष को ज्ञात हो तो राव देवा की कैसी किरकिरी होती और बारात पक्ष भी किसी अनहोनी की आशंका से ग्रसित हो सकता था। राव देवा घबराया। हताश होकर पुनः भाग कर माँ के मन्दिर में माता के समक्ष उपस्थित हुआ। माँ के चरणों में शीश झुकाकर बार-बार चरण स्पर्श कर क्षमा याचना करने लगा। द्वार पर नियुक्त सेवक की लापरवाही और उसके विलम्ब से घटित इस
अकस्मिता के प्रति स्वयं को जिम्मेदार मानकर देवा ने माँ से गिड़गिड़ा कर क्षमा मांगते हुए बार-बार आमंत्रण आग्रह व प्रार्थना की। राव देवा के विनम्र आग्रह एवं पश्चाताप भाव से द्रवित होकर माँ ने उसे क्षमा करते हुए सायंकाल के वक्त अपने उपस्थित होने की स्वीकृति प्रदान
की। राव देवा ने माँ के स्वागत हेतु सावधानी के साथ सारी व्यवस्थाएं भली प्रकार करने के साथ वहां होशियार एवं व्यवहार कुशल सेवक वृन्द को नियुक्त कर दिया। सायंकाल का समय आने लगा। चारों ओर धीरे-धीरे रोशनी जगमगाने लगी। बारात के लोग शानो-शौकत के
साथ आपस में बतियाने लगे। वाद्य यंत्रों की मधुर ध्वनि तथा प्रवेश द्वार पर राजशाही नक्कार खाने की आवाज माहौल को खुशनुमा बना रही थी। शनै-शनै बरातियों के समक्ष कीमती शराब की बोतलें और पेय पदार्थ के बर्तनों में शराब परोसी जाने लगी और धीरे-धीरे माहौल मादकतापूर्ण होता गया। ऐसे समय में एक अति सुन्दर महिला अप्सरा सी श्रृंगारित धीरे-धीरे वहां होकर गुजरती नजर आई। उसकी पायलों की झंकार की आवाज सुनकर बाराती आकर्षित हो उसकी ओर देखने लगे तथा उक्त महिला के सौन्दर्य से आकर्षित शराब के नशे में कुछ
का कुछ अश्लील बोलने लगे। शराब का भरपूर नशा आदमी को
मतवाला बना देता है। अपने पराये और हित-अनहित का भाव ही नहीं रहता। इस मतवालेपन की स्थिति में बरातियों ने उस सुन्दरी महिला की प्राप्ति के लिये आपस में नोक-झोंक करते झगड़ना प्रारम्भ कर दिया। देखते ही देखते तलवारें खिंच गई। भयंकर मारकाट मच गयी और बाराती आपस में ही कट मरे। तब वह सुन्दर महिला एक अट्टहास के
साथ लुप्त हो गयी। शादी के रंग में भंग हो गया। ऐसा कहा जाता है कि देवी के इस प्रकार हुए अपमान से हाड़ा वंश को बड़ा आघात लगा। माता ने क्रोधित होकर देवा को कहा "जिस राजमद एवं अहं
में तूने मुझे बुलाने एवं अपमानित करने का दुस्साहस किया है, तेरा यह राज और राजमद नष्ट हो जायेगा। ऐसा सुनकर राव देवा ने माता से पछताते हुए अपनी गलती की बारम्बार क्षमा मांगी।
माँ ने राव देवा को कहा -"मैं जानती थी कि तू मेरे सत्कार एवं सम्मान की व्यवस्था नहीं कर पायेगा। तेरा आग्रह श्रद्धा एवं भक्ति के कारण नहीं बल्कि राजप्रमाद के कारण था। अतः तुझे दण्ड मिलना ही चाहिये।"
मन्दिर परिसर में 64 देवियों के दर्शन
मंदिर के पुजारी के अनुसार इस प्राचीन प्रमुख शक्ति पीठ जोगणिया माता मंदिर परिसर में चारों और अनेकों देवीयो की प्रतिमा की स्थापना की गई हैं. इनमें 64 जोगणिया देवियों के स्वरूप के रूप में प्रतिमा स्थापित की गई है. जिसमें विशेष रूप से भारत माता, मां शैलपुत्री, मृदंग वादिनी, वीणा वादिनी, मां महागौरी, शहनाई वादिनी, माता कालरात्रि, माता सूर्यपुत्री, माता वायु वीणा और मा अघोर, माता भद्रकाली, माता धूमावती, माता गंधारी, माता सर्वमंगला, माता अजीता, माता गंगा, मां चामुंडा, मां मूर्ति, मा वायु वेगा, माता ब्राह्मी, माता ज्वालामुखी माता, आयोगनी मां, यमुना, मां चंद्र कांति माता समुद्र, माता नारायणी, माता उमा, माता काली, माता स्तुति माता, गटाबरी माता, कामायनी माता, अंबिका मां महेश्वरी माता कावेरी माता रात्रि, मां कंकाड़ी सहित कहीं देवियों के दर्शन भक्तों को एक ही परिसर में होते हैं.